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हायपोथायरायडिज्म में उपयोगी – काक्ल रक्षक योग /

हायपोथायरायडिज्म में उपयोगी – काक्ल रक्षक योग / 

Kaaklarakshak Yoga in Hypothyroidism 

थायरॉईड हार्मोन की उत्पत्ती काकलक/ अवटुका ग्रंथी (Thyroid gland) द्वारा होती है और जो शरीर की चयापचय प्रक्रिया (Metabolism) का नियंत्रण करती है।

यह हार्मोन का प्रभाव लगभग शरीर के सभी अवयवों पर होता है।

काकलक ग्रंथी द्वारा थायरॉईड हार्मोन्स (T3 और T4) की पर्याप्त मात्रा में उत्पप्ति न होनेपर हायपोथायरायडिज्म नामक विकार उत्पन्न होता है।

जिसमें शरीर के लगभग सभी उतकों के चयापचय दर (Basal Metabolic Rate) में कमी आती है।

हायपोथारायरायडिज्म यह रक्त में FT3 तथा FT4 की अपर्याप्त मात्रा का निदर्शक है जिसके परिणामस्वरुप TSH ( Thyroid Stimulating Hormone) की मात्रा में वृध्दि होती है।

इसका स्वरुप उपनैदानिक (Subclinical ) या अपरोक्ष ( Overt) हो सकता है। कई व्यक्तियों में इसके लक्षण स्पष्ट रूप से दर्शित न होने के कारण उचित समय पर निदान नहीं हो पाता। 

तमकश्वास (Bronchial asthma), स्थौल्य (Obesity), मधुमेह (Type 2 Diabetes Mellitus), मेदोरोग (Dyslipidaernia) तथा उच रक्तचाप (Hypertension) ग्रसित भारतीय रुग्णों में हायपोथायरायडिज्म अधिकांश रुप से पाया जाता है। इसका प्रचलन पुरुषों की तुलना से सियों में अधिक है। इस विकार में अनुवंशिकता भी देखी गई है। 

हाशिमोटो रोग (Autoimmune disorder) यह हायपोथायरायडिज्म का मुख्य कारण है। हायपोथायरायडिज्म के अन्य महत्वपूर्ण कारणों में आयोडिन की अल्पता, काकलक ग्रंथि शस्त्रकर्म और विकिरण चिकित्सा हैं। हायपोथायरायडिज्म के सामान्य लक्षणों में थकान, मांसपेशियों में दौर्बल्य, त्वकृपारुष्य, बालों का पतला होना, स्थौल्य, मंदनाडी, शीत असहिष्णुता, मलावष्टम्भ, मानसिक अवसाद तथा अनियमित रजः स्राव है। हायपोथायरायडिज्म स्त्रियों की प्रजननक्षमता तथा यौनसंबंध पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।” 

आयुर्वेद दृष्टिकोण से

हायपोथायरायडिज्म (काकलक ग्रंथि क्रियाल्पता) इस रोग का वर्णन आयुर्वेद के शास्त्रीय ग्रंथो में नहीं हैं। अनुक्त व्याधि के निदान और चिकित्सा की संकल्पना के आधार पर इसे उचित रुप से समझा जा सकता है। चरकाचार्य के अनुसार सभी व्याधियों को विशिष्ट नामकरण नही किया जा सकता, परन्तु व्याधि की प्रकृति, उसके अधिष्ठान तथा हेतुओं को ध्यान में रखकर उन्हें समझ सकते है तथा तत् पश्चात् चिकित्सा नियोजन कर सकते है। (च.सू. १९/४६)

मिथ्याहारविहाराभ्यां दोषाः काकलकाश्रयाः। 

कुर्वन्ति काकलमांद्यं धात्वग्नीन् मन्दीकृत्य तु ।। – अनुक्त

पिछले कुछ वर्षों में हायपोथायरायडिज्म की आयुर्वेद सम्प्राप्ति को समझने के लिए महत्वपूर्ण संशोधन कार्य किए गए है और इनमें से बहुतांश संधोधनकर्ताओं का मानना है कि इसकी सम्प्राप्ति में अग्नि दृष्टि यह एक महत्वपूर्ण कारण है। 

यह एक कफ-वातप्रधान व्यापि मानी गई है जिसमें मुख्यरुप से रसवह सोतस की दुष्टी होती है। विभिन्न हेतुओं के परिणामस्वरुप पात्वग्नि मन्द हो जाती चलकर अन्य धातुओं के पोषण को प्रभावित करती है विशेषतः को प्रभावित करती है। काकलक ग्रंथि का मुख्य कार्य देहोष्मा तथा मूलतम चयापचय दर (BMR) को नियंत्रित करना है, इसलिए इसका कार्य भूताग्नि से भी सम्बन्धित हैं। इस प्रकार, अग्नि के सभी १३ प्रकार (जठराग्नि, ७ धात्वम्नि और ५ भूतानि) हायपोथायरायडिज्म में क्षीण हो जाते हैं, जिससे विभिन्न शारीरिक तथा मानसिक लक्षण उत्पन्न होते हैं।

 हायपोथायरायडिज्म (काकलक ग्रंथि क्रियाल्पला) के सम्प्राप्ति घटक 

दोष 

कफ और वातदोषवृद्धि तथा पित्तक्षया 

दूष्य 

सभी धातु विशेषरुप से रस तथा मेदोधातु।

अग्नि

जठराग्नि, धात्वग्नि तथा भूतान्नि। 

आम 

जठराग्नि तथा धात्वम्नि  के विकृती के कारन उत्पन्न |

स्रोतस् 

सभी सोतस, मुख्यतः रसवह सोतस तथा मेदोवह स्त्रोतस। 

स्त्रोतोदुष्टी 

संग एवं विमार्गमन के कारण स्त्रोतोदृष्टि।  

उद्भव स्थान 

आमाशय। 

अधिष्ठान 

काकलक या गलमणि या कण्ठमणि।

काकलकं गलमणि घण्टिकेति लोके।

 काकलकं कण्ठमणिः कण्ठस्योन्नत  प्रदेशः।।- डल्हण 

हायपोथारायडिज्मकी आयुर्वेद चिकित्सा 

यद्यपि आयुर्वेद औषधियों द्वारा Hormones शिथिलता (Immune dysfunction) की आपूर्ति संभव न हो परंतु प्रतिरक्षा तथा काकलक उतकों में शोथ का नियंत्रण करने के लिए इस प्रकार से चिकित्सा की जा सकती है।

 अग्निदीपन (पाचन तथा चयापचय में सुधारणा)

 दोष साम्य प्रस्थापित करना (कफ-वात-शमन) 

स्रोतोशुद्धी (स्रोतसावरोध दूर करना)

रसायन गुणों से युक्त औषधियाँ भी हायपोधायरायडिम की चिकित्सा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। .

काक्लरक्षक योग की हायपोथायरायडिज्म में उपयोगिताः 

काक्लरक्षक योग, नाम ही दर्शाता है कि यह काकलक ग्रंथि (Thyroid gland) के प्राकृत कर्म को संरक्षित करने के लिए उपयुक्त योग है। काक्लरक्षक योग यह काकलक ग्रंथि की कार्यक्षमता को प्राकृत करनेवाला, आयुर्वेद के सिध्दांतों पर आधारित संयुक्तिक योग हैं। 

काक्लरक्षक योग शोधित गुग्गुल, कांचनार, अश्वगंधा, चित्रक, कुटकी और गुडूची जैसे कालानुसार परीक्ष्य औषधिद्रव्य का लाभ दिलाता है। सभी औषधिद्रव्य सहक्रिया में कार्य करके काकलक ग्रंथि की क्रियाल्पता को सुधारते हैं। यह औषधिद्रव्य धात्वग्निमांद्य, विशेषतः रसधात्वग्नि मांद्य और मेदोधात्वग्नि मांद्य को दूर करते हैं तथा प्रकुपित कफ और वातदोष की सामावस्था को प्रस्थापित करते हैं। 

औषधि घटक जैसे शोधित गुग्गुल, चित्रक और कुटकी मेदधातु का चयापचय सुधारकर शरीरभार कम करते हैं। अश्वगंधा और गुडूची उर्जस्कर कार्य करती है तथा प्रतिरक्षा शिथिलता को नियंत्रित करती है।

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