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गॉल ब्लैडर (पित्ताशय )की पथरी / Gall Bladder Stone

गॉल ब्लैडर (पित्ताशय )की पथरी / Gall Bladder Stone

आज के समय में पित्ताश्मरी के रोगी बहुत बड़ी संख्या में है, और निरंतर बढ़ते ही जा रहे है।  सवाल उठता है की की आखिर ऐसी कोनसी वजहें है जो इस रोग को तेजी से बढ़ाने में लगी हुई है।

गॉल ब्लैडर की पथरी : निदान एवं चिकिस्ता

इस बात का जवाब ढूंढने में कई कारण दिखाई देते है , इन कारणों को दो भागो में बांटा जा सकता है , एक भाग में मुख्य कारण और दूसरे में सहायक कारण।
संक्रमण, पित्त का अवरोध और कोलेस्टेरोल का ज्यादा बढ़ना – मुख्य कारन माने जा सकते है जिनसे पित्त की थैली में पथरी बनने लगती है।
सहायक कारणों में निम्न को माना जा सकता है –

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उम्र –

जब व्यक्ति की उम्र ४० साल को पार कर जाती है , तब पित्ताश्मरी की संभावना बढ़ जाती है।

लिंग-

हालांकि पित्ताश्मरी का रोग स्त्री-पुरुष किसी को भी हो सकता है , फिर भी महिलाएं इस बीमारी की चपेट में ज्यादा आती है।

आदत-

आलस्यपूर्ण जीवन व्यतीत करना अथवा बैठे बैठे काम करने वालो को पित्ताश्मरी का रोग ज्यादातर होने की संभावना रहती है।
इस प्रकार ऊपर बताये मुख्य और सहायक कारण पित्ताश्मरी को पनपाते है, लेकिन कुछ परिस्थितियां भी ऐसी होती है जिनमे इस रोग के पनपने की संभावनाएं बढ़ जाती है , जैसे –

  • गर्भावस्था , ह्रदय एवं फुफ्फुस के पुराने रोग।
  • आनुवंशिकता।
  • मोटापा भी इस रोग का एक कारण बन सकता है।  इसके अलावा गोरी त्वचा वाली महिलाओ को यह रोग अपेक्षाकृत अधिकता से होता है।
  • मौसम का असर भी पित्ताश्मरी को पनपाने का कारन बन सकता है।  शीतोष्ण कटिबन्धी इलाको में रहने वाले इस रोग की चपेट में अपेक्षाकृत अधिक आते है।

सहायक कारणों को चिकिस्तक निम्न 5f  के नाम से भी याद करते है।
१ फैटी
२ फीमेल
३ फोर्टी
४ फरटाईल
५ फेयर
ऊपर जो मुख्य कारण बताये है, तो यहाँ इस बात को भी समझना ठीक रहेगा की इन कारणों से पित्ताश्मरी आखिर किस तरह बन जाती है , अब इसे ही समझे।

१ संक्रमण के कारण –

मिश्रित या संक्रमित अश्मरी पित्ताशय की सूजन की वजह से बनती है।  इस सूजन के कारण पित्त घोलक एवं पित्त लवण में कोलेस्टेरोल का रासायनिक संघटन ढीला पड़ जाता है , जिससे वे आसानी से टूट जाते है। जब पित्त लवण कोलेस्टेरोल को अलग क्र देता है तब यह अवक्षेपित हो जाता है।  सामान्य पित्ताशय में पित्त, लवण और कोलेस्टेरोल को अवशोषित कर लेता है लेकिन कोलेस्टेरोल बहुत धीरे-धीरे अवशोषित होता है। इस कारण कोलेस्टेरोल की अवक्षेपित होने की प्रवृत्ति हो जाती है। जब कोलेस्टेरोल का केन्द्रक बन जाता है तब बिलीरूबानी इसके चारो तरफ मिश्रित पथरी बनाने लगती है।

२ अवरोध के कारण –

जो स्त्रिया बहु प्रसवा , मोटी एवं ४० वर्ष से अधिक आयु की होती है।  उनमे प्रायः अवरोध के कारण अश्मरी बनती है।  क्योंकि गर्भावस्था में वसायुक्त भोजन लेने से भी पित्ताशय रिक्त नहीं हो पाता है।  गर्भावस्था में पित्त पिण्ड एवं वृक्क चार गुणा अधिक कोलेस्टेरोल बनाता है , लिहाजा बहुप्रसवा यानी जो बार-बार गर्भधारण करती है , ऐसी स्त्रियों में पित्ताश्मरी अधिक मिलती है।

३ पित्त एवं रक्त में कोलेस्टेरोल की अधिक मात्रा से –

इसमें पित्त के पतन के कारण प्रतिक्रियास्वरूप पित्त गाढ़ा होने लगता है। कोलेस्टेरोल की मात्रा बढ़ जाती है और पित्त लवण का संग्रह होने लगता है।  जिसके फलस्वरूप पित्ताशय में कोलेस्टेरॉल अलग होने लगता है और अश्मरी बनना प्रारम्भ हो जाता है।
कोलेस्टेरोल , बिलीरुबीन एवं कैलशियम ये तीनो अश्मरी के मुख्य घटक है इन घटको के आधार पर अश्मरी का वर्णीकरण निम्न प्रकार किया गया है –
१ कोलेस्टेरोल अश्मरी
२ रञ्जक अश्मरी
३ मिश्रित अश्मरी

१ कोलेस्टेरोल अश्मरी

कोलेस्टेरोल का चयापचय ठीक तरह से न हो पाने के कारण यह अश्मरी बनती है, अतएव इसे चयापचयजन्य अश्मरी कहते है।  यह सफेद रंग की बड़े आकार की अण्डाकार प्रायः संख्या में एक , हल्की चमकती हुई मणिका जैसी होती है।  पित्ताशय में अधिक पित्त कोलेस्टेरोल एवं अवरोध रहने से कोलेस्टेरोल एवं अवरोध रहने से कोलेस्टेरोल अश्मरी बनती है। यह शान्त अश्मरी होती है।  सामान्यतः इसके कोई ख़ास उपद्रव दिखाई नहीं देते, लेकिन जब ऐसी अश्मरी पित्ताशय की गर्दन में अटक जाती है, तब परेशानी पैदा क्र देती है।  पित्ताशय की सतह पर बिलीरुबिन कैलशियम एकत्र होने से पथरी का निर्माण होता है।

२ रञ्जक अश्मरी

यह संख्या में एक या अनेक , बहुत छोटी भुरभुरी सी एवं बिलीरुबिन से युक्त रहती है।  इसमें कोलेस्टेरोल नहीं रहता।  ऐसी पथरी रक्तक्षयजन्य कामला रोग में भी मिल सकती है।  चयापचय में दोष होने से भी इसकी उत्पत्ति होती है।

३ मिश्रित अश्मरी

यह कोलेस्टेरोल बिलीरुबिन या फिर कैलशियम की बनी होती है।  इसमें ८० प्रतिशत पित्त रहता है।  इस तरह की पथरी का रंग पीला या फिर भूरा ऐसा होता है एक पथरी रहने पर इसका तल चमकीला होता है।
अश्मरी के दो या तीन परिवार है।  प्रत्येक परिवार के सदस्य का आकार, उत्पत्ति का समय एक ही हो जाता है।

लक्षण –

पथरी के स्थान और परिस्थिति के अनुसार रोग और लक्षण भिन्न भिन्न स्वरुप के मिलते है।  जब पथरी पित्ताशय में रहती है उस समय रोगी को सामान्यतः यह अहसास ही नहीं होता की वह पित्ताश्मरी का मरीज है , क्योंकि इस समय उसमे कोई खास लक्षण नहीं दिखाई देता। रोगी को पथरी का दर्द तब शुरू होता है जब बहुत समय से बनी हुई पथरी की वजह से पित्ताशय में सूजन होने और फिर दर्द होने से यह समझा जा सकता  है की पित्त की थैली में सूजन हुई है।
पित्तकोष नलिका या साधारण पित्त नलिका में जब पथरी अटकती है तब दर्द बहुत बढ़ जाता है।  यह दर्द इस बात का संकेत है की पित्ताशय की पथरी उपद्रव करने लगी है। खेलने, गाडी-स्कूटर चलाने या गरिष्ट ( देर से पचने वाला ) भोजन करने के बाद अचानक आमाशयिक प्रदेश में पीड़ा होने लगती है , यह दर्द लहर के रूप में बढ़ता हुआ दायी ओर बगल में पहुंचता है।  दर्द पसलियों के दक्षिण भाग में नीचे की तरफ से होते हुए पीठ में चुभने के समान होता हुआ दाइने कंधे की ओर चलता है।
पित्त की पथरी का यह दर्द निचे कभी नहीं जाता है।  जिस समय जोर से दर्द होता है , उस समय उदर के उपर चतुर्थ भाग को दबाने से पीड़ा और मांसपेशियों में संकोच मिलता है। अगर पथरी पित्तकोष नलिका में होती है तब पित्ताशय में सूजन बढ़ जाती है और जब पथरी पित्त नलिका में होती है तब पित्त नलिका में इसकी वजह से अवरोध होता है , लिहाजा रोगी कामला रोग से भी पीड़ित हो जाता है।  यह कामला (जॉंडिस ) छुपा हुआ सा हल्के रूप में होता है जिसकी जानकारी सीरम विलिरूबिन परीक्षा करने पर होती है।  ऐसी स्थिति में अस्थाई तौर पर प्रायः मूत्र कालापन लिए हुए आता है।  पित्त शूल साथ पित्त नली में अवरोध से उत्पन्न कामला ( जॉंडिस ) के लक्षण भी दिखाई पड़ते है।  यह प्रायः पूर्ण अवरोध नहीं होता है और करीब एक से दो सप्ताह तक ही रहता है।
कुछ रोगियों में पित्त नली की सूजन और पित्त नलिका यकृतीय शोथ ( लिवर पर सूजन) ये दोनों प्रकार मिलते है, ऐसा होने पर रोगी को बुखार होता है , उसे सर्दी लगाती है और लिवर बढ़ा होता मिलता है।  लम्बे समय से पथरी की सूजन की वजह से कुछ रोगियों में चिकनाई ( घी तेल ) युक्त भोजन कर लेने के बाद अपच की शिकायत अकसर मिलती है।  अधिकतर रोगियों को आमाशयिक प्रदेश में पेट भरा होना, मिचली का अनुभव होता है।  आनाह ( अफारा )के साथ उन्हें अतिसार ( दस्त रोग ) ये दोनों भी होते है।  इस लक्षण को पित्ताशयजन्य अपचन भी कहा जाता है।  चिकिस्तक को चेकअप करते समय इन सब लक्षणों को ध्यान से समझकर रोग तक पहुँचना चाहिए।

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सापेक्ष निदान तालिका

१.रोग –

पित्ताशय की पथरी का दर्द

स्थान एवं विस्तार –

दायी और यकृत स्थान से पीठ की तरफ से होता हुआ कंधे की तरफ गति करता दर्द

लक्षण-

कामला – यकृत रोगो में पाया जाने वाला लक्षण

आयु एवं लिंग –

मोटी , बहुप्रसूता स्त्रियों, ४० वर्ष की उम्र के आस पास।

२.रोग –

आंतो का दर्द

स्थान एवं विस्तार –

 नाभि के समीप भयंकर शूल , दबाने पर कम हो जाने वाला।

लक्षण-

मलावरोध , अतिसार एवं वमन

आयु एवं लिंग –

स्त्री-पुरुष दोनों को किसी भी आयु में।

३.रोग –

गुर्दे का दर्द

स्थान एवं विस्तार –

तेजी से पीछे के भाग में, निचे वृषण की ओर गति वाला।

लक्षण-

मूत्र शर्करा , रक्त युक्त मूत्र, बार बार मूत्र त्याग या मूत्र कृच्छ

आयु एवं लिंग –

प्रायः पुरुषो में बच्चो एवं युवा में।

४.रोग –

आन्त्रपुच्छ शोथ ( एपेन्डीसाइटिस की सूजन )

स्थान एवं विस्तार –

मेकबर्नी बिन्दु पर दबाने से अधिक दर्द होना

लक्षण-

वमन , स्थानिक काठिन्य दबाने पर दर्द , तेज बुखार

आयु एवं लिंग –

किसी भी आयु में स्त्री / पुरुष दोनों में समान रूप से।

रोग का सापेक्ष निदान

यदि यह दर्द नहीं हो या अवरोध के कारन कामला रोग भी नहीं उभरा हो तो काफी दिनों तक पित्ताशय की पथरी का पता लगाना  कठिन हो जाता है।  लम्बे समय तक आमाशय की सूजन , परिणामशूल , हर्निया आदि अनेक रोगो में भी अपचन की शिकायत रहती है अतः अपचन रोग से इस रोग का सही निदान नहीं हो पाता है।  इसलिए अल्ट्रा सोनोग्राफी का सहारा लेना चाहिए।
पित्तज शूल जब अश्मरी निर्माण के समय होता है तो वह सप्ताहों या महीनो तक लक्षण ही न होता है।  और कभी कभी थोड़ा रुक रुक के दर्द होता है।  अतः कोलेसीस्टोग्राफी अथवा सोनोग्राफी कराकर इसका सही निदान अवश्य करना चाहिए।
जब अवरोधक कामला रोग मिलता है तब साधारण पित्त नलिका में अश्मरी और अग्न्याशय  के शीर्ष भाग के कैंसर में साक्षेप निदान करना चाहिए।  अग्न्याशय  शीर्ष कैंसर होने पर भार कम होता जायेगा।  इसमें पित्तज नहीं रहता जबकि कामला प्रायः बढ़ता ही जाता है।  स्पर्श करने या हल्का दबाने पर दर्द, बढ़ा हुआ पित्ताशय इस बात की जानकारी देता है की साधारणतः पित्त नलिका में अवरोध कैंसर के कारन नहीं है।  बल्कि अश्मरी से है।  पित्ताशय में लम्बे समय से होती जा रही सूजन एवं अश्मरी के कारण पित्तनलिका का अवरोध कैंसर के द्वारा हुआ है या शान्त अश्मरी से, इसका साक्षेप निदान कठिन होता है।  शल्य क्रिया के समय शान्त अश्मरी साधारणतः नलिका में मिलती है।  किन्तु कैंसर में शल्य क्रिया करने के पहले ही संशय हो जाता है।

रोग के उपद्रव –

जब अश्मरी पित्ताशय में से निकलकर पित्त स्त्रोतों से पित्त के साथ बाहर निकलने का प्रयत्न करती है तब उपद्रव प्रारम्भ हो जाता है।

  1. यदि पित्ताशय में पूय ( पस ) की अधिकता युक्त शोथ ( सूजन ) हो तो वह फूल जाता है और उदर्याकला के पास होने के कारण वहा भी दबाव के कारण सूजन आती है। 
  2. यदि पित्ताशय की सूजन लम्बे समय से हो तो पित्ताशय कोष मोटा होता है और पित्ताश्मरी के चारो तरफ इसका आवरण बनकर वः बंद हो जाता है फिर लगातार पीड़ा होती है और पित्ताशय में कैंसर हो जाता है। 
  3. जब पित्ताश्मरी पित्त के साथ सरकने लगती है तो शूल की उत्पत्ति होती है और यह अश्मरी जब आंत में पहुँच ती  है तो तब शूल दूर हो जाता है। 
  4. जब पित्ताश्मरी बड़ी होने पर नलिका में रुक जाती है और वहां शोथ हो जाता है।  फिर नाड़ीव्रण ( नासूर ) होकर अश्मरी अमाशय , ग्रहणी, बड़ी आंत या उदर्याकला   के किसी स्थान में निकल जाती है।  यह उदर्या कला में जाती है, तो शोथ उत्पन्न करती है। 
  5. पित्ताश्मरी बड़ी होने से कभी आंत में फंस जाती है और आंत्रावरोध उत्पन्न कर देती है। 
  6. कभी कभी यकृत विद्रधि चिरकारी अग्न्याशय शोथ को जन्म देती है। 

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